‘‘जो समय रहते स्वयं को नहीं बदलता उसके न तो हालात बदलते हैं और न ही किस्मत...!’’ ठप्पा नहीं चलेगा

‘‘बहुत हुआ, अब ठप्पा नहीं चलेगा, औरों के लिए बहुत काम कर लिया, अब तनिक अपने लिये भी करके देखूं।’’ मोबाइल पर आए मैसेज को पढ़ते हुए पर्वतराज बुदबुदाने लगा। ‘‘महानगर में तो इसलिए भी पड़ा हुआ था कि गांव में माता-पिता की शान थी कि उनका बेटा भी शहर में ऊंचे ओहदे पर है, अब जबकि सबको पता चल ही गया है कि प्रवासी मजदूर हैं तो अब कुछ बनके ही बताना है, वो भी इसी, यहीं गांव में रहकर। ये लोग क्या समझते हैं, हम कुछ कर नहीं सकते हैं, हमारा शहर का अनुभव कब काम में आएगा। वहां तो हम तरक्की की आस में मेहनत करते रह गए, लेकिन अब हम सच में मनेजर बनके बता देंगे।’’

तभी मुंह पर मास्क लगाये गांव के कुछ लोग आंगन के पास की गैल से निकले और कहने लगे चलो पर्वतराज चीन के हमले में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करना है। एक पड़ोसी पास में ही रूककर पूछने लग गएः ‘‘मोबाइल में क्या खोये हुए हो, स्कूल के मैदान में चलना है।’’

 पर्वतराज ने कहा कि ‘‘लॉकडाउन समाप्त हो गया है और फैक्ट्री से मैसेज आया। कह रहे हैं काम फिर शुरू हो गया है चले आओ।’’ उठकर मैदान की ओर चलते हुए। ‘‘पर अब हम नहीं जाने वाले, यहीं कुछ करके दिखायेंगे।’’ पड़ोसी हंसी के अंदाज मेंः ‘‘अरे यहां क्या धरा है?’’ पर्वतराज ने गंभीर होते हुए कहाः ‘‘हमारा गांव शहरों से कम है क्या? कुछ क्षण चुप रहकर तेज कदम बढ़ाते हुए फिर कहा : “गांव में ही सबकुछ धरा है, हमसे कच्चामाल लेते हैं और हमको ही परिवर्तित कर चार गुना दामों में बेच देते हैं।’’

 दोनों मैदान में बात करते हुए पहुंच गए। जहां भारत माता के जयकारे लग रहे थे। सभी ने दो गज की दूरी बनाते हुए दो मिनिट का मौन रखा और गलवान घाटी में संघर्ष करते हुए चीन के हमले में शहीद हुए जवानों को श्रद्धासुमन अर्पित किये। इसके बाद सबने मिलकर चीनी सामान का बहिष्कार करने का संकल्प लिया। उपस्थित लोगों ने चीन के कायराना हमले की निंदा की और संकट में सेना के साथ खड़े रहने की बात कही। ग्रामीण, चीन को सबक सिखाने के बारे में ओजपूर्ण तरीके से अपनी बात कह ही रहे थे कि एकाएक पर्वतराज बोल उठाः ‘‘ऐसे कहने भर से कुछ नहीं होगा। हमें सस्ते सामान का विकल्प तलाशना होगा। ऐसा कुछ करना होगा ताकि हमारे देश में बना सामान लोगों की पहली पसंद हो, और विश्वास रखिए ऐसा किया जा सकता है।‘’ सबने तालियां बजा दीं। पर्वतराज ने कहा: ‘‘आत्मनिर्भरता केवल चिल्लाने से नहीं आएगी, ऐसी तकनीक विकसित करना होगी ताकि विदेशी उत्पादों का हम मुकाबला कर सकें।’’

 पर्वतराज तो कहकर चुप हो गया, उसके भाषण को सराहना भी खूब मिली, लेकिन उसके सामने एक नई चुनौती आ खड़ी हुई। ‘‘जोश में आकर कह तो बहुत कुछ दिया, पर मुश्किल यही कि कहे को साकार कैसे करें?’’

 लौटते समय पड़ोसी भी साथ हो लिये। कहने लगेः ‘‘सही कहा आपने, बस ये ठप्पा हटाना है। चाहे सामानों पर विदेशी ठप्पा हो या माथे पर मजदूरी का ठप्पा] अब हटाकर ही रहेंगे।’’ पर्वतराज पड़ोसी की ओर आश्चर्य से देखने लग गया, जैसे उसके ही मन की बात कह दी हो। वह भी यही निश्चय कर चुका था कि प्रवासी मजदूर का ठप्पा वह मिटाकर रहेगा। यदि महानगर वापस चला गया तो गांव में कहलायेगा तो श्रमिक ही न, फिर क्यों न यहीं रहकर इस ठप्पे को हटा दिया जाए।

 विचारमग्न पर्वतराज को रात में ठीक से नींद नहीं आई। सुबह जल्दी उठकर वह बागड़ में आ गया। उसने देखा आसपास के गांव में सोयाबीन और दालें खूब होती हैं, लेकिन गांव वाले उनका पूरा उपयोग नहीं कर पाते और फसल होने पर सीधे मंडी में ले जाकर बेच देते हैं। यदि गांव में ही सोयाबीन का तेल, पोहा, पनीर बनने लगे तो....!! लेकिन इसके लिए बड़े बजट की आवश्यकता होगी। उसके पास पूंजी कम है, वह तो छोटे स्तर से काम शुरू करना चाहता है। फिर उसने पशु आहार की इकाई गांव में स्थापित करने का मन बनाया। अपनी पत्नी को इस योजना से अवगत कराया। वह संशय में अवश्य पड़ गई, लेकिन कहने लगी: ‘‘सोच कर बताती हूॅं।’’

 पर्वतराज की पत्नी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन समाचार-पत्र पढ़ने की आदत हमेशा रही। कहने लगीः ‘‘जो समय रहते स्वयं को नहीं बदलता उसके न तो हालात बदलते हैं और न ही किस्मत...! इसीलिए इस बारे में अधिक-से-अधिक जानकारी जुटाकर काम करें तो सफल हो सकते हैं। फिर दोनों ने तय किया कि जिस प्रकार से सरकार अपने राज्य में औद्योगिक घरानों को निवेश के लिए आमंत्रित करती है वह भी उद्योगपतियों को गांव में उद्योग स्थापना के लिए पत्र लिखेंगे।
 
संसाधनों से भरपूर गांव की खूबियों के बारे में फैक्ट्री मालिक को पता चला तो वह सोयाबीन तेल का कारखाना लगाने को तैयार हो गए। साल भर में ही गांव में दाल मिल भी स्थापित हो गई। अब पर्वतराज का काम कुछ आसान हो गया। गांव में ही पास के ही कारखानों से मिली सोया-खली और दालों के बेकार छिलकों को लेकर पर्वतराज ने पशुआहार की यूनिट लगा ली। मुश्किल ये थी कि कोई भी शक्कर कारखाना लगाने गांव में नहीं आया, इसलिए शीरा पास के ही प्रदेश से मंगाकर अच्छी गुणवत्ता का पशुआहार गांव में ही बनने लग गया और पालतू पशुओं के आहार की एक बड़ी समस्या हल हो गई।
 
पर्वतराज की उपलब्धि ने लोगों को प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि गांव में ही फसलों के अच्छे दाम और रोजगार के अवसर भी बढ़ते देखे। पर्वतराज का गांव आदर्श गांव के रूप में देखा जाने लगा। माथे से मजदूर का ठप्पा हटते ही पर्वतराज ने स्वयं को मैनेजर के रूप में पाया, किसी फैक्ट्री का नहीं, बल्कि गांव का मनेजर। एक प्रवासी मजदूर की रंग लाती कोशिशों को सभी ओर सराहना मिली तो माता-पिता भी खुश होकर कहने लगे कि पर्वतराज ने न केवल शहर जाना सार्थक किया, बल्कि वापसी को भी कारगर साबित कर दिखाया।
 
देखा-देखी और गांवों के लोगों का भी आत्मविश्वास बढ़ा और वे भी स्वयं की जरूरतों का सामान बनाने लगे।                                                                                                                                                 ''आशीष अनमोल'' 
                                                                                                       
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