घर की "ज्योति"

शादी हुई भी नहीं थी और रामराज ने यह सोच लिया था कि वह अपने परिवार को सीमित रखेगा और एक ही बच्चे को अच्छे-से रखेगा। वह छोटा परिवार-सुखी परिवार के नारे पर विश्वास रखता। इसका कारण भी था कि उसकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। वह नहीं चाहता था कि जिस तरह के अभाव में वह रहा है उस तरह के अभाव में उसके बच्चों को जिंदगी बिताना पड़े।

शादी के बाद रामराज ने अपनी जीवनसंगिनी को भी ये बात बता दी, जीवन संगिनी की भी मूकसहमति थी। दोनों चाहते तो थे कि पहला बच्चा परिवार में बेटा ही हो और फिर नसबंदी करा लेंगे, लेकिन पहली बेटी हुई तो उन्होंने अपना निर्णय कुछ दिन के लिए टाल दिया। घर में बेटी आई तो सभी ने कहा लक्ष्मी आई है घर में। और फिर बेटी के होने के साथ ही रामराज की महानगर में एक बड़े कारखाने में नौकरी भी लग गई।

रामराज ने जब यह सुखद समाचार घर में सुनाया तो बड़े-बुजुर्गों ने कहा: ‘‘बच्चे अपना भाग्य लेकर स्वयं आते हैं।’’ जीवन सुचारू रूप से चल रहा था। त्यौहारों पर रामराज अपने घर पहुंचता तो सभी ओर खुशियां छा जातीं।

पहली बेटी जब स्कूल जाने लगी तो रामराज को लगा वह एक और बच्चे का ठीक से लालन-पालन कर सकते हैं, इसलिए पति-पत्नी दोनों ने तय किया कि वे दूसरे बच्चे के बाद नसबंदी करा लेंगे। बेटी दो घरों को संवारेगी तो बेटा बुढ़ापे का सहारा बनेगा। हमारा परिवार पूर्ण हो जाएगा।

लेकिन जैसा इंसान सोचता है हमेशा वैसा ही कहां होता है? रामराज के घर दूसरे बच्चे के रूप में भी बेटी ही जन्मी। फिर भी पत्नी निराश न हो इसलिए रामराज ने उसे दिलासा दिया और कहा कि अब तो बेटियों का ही जमाना है। वह दिन गए जब लोग बेटों के भरोसे रहते थे। फिर मुझे ही देखो न। अपने माता-पिता की कितनी सेवा कर पाता हूं। दूर महानगर में पड़ा हूंॅ रोजी-रोटी के लिए। हम दोनों बेटियों को ही अच्छे से पालेंगे।

दोनों बेटियां घर में बड़ी होने लगीं और रामराज महानगर में पहले से अधिक परिश्रम कर कमाने लगा, ताकि दोनों बेटियों को अच्छे से पढ़ा-लिखा सके और उनको आत्मनिर्भर बना सके। हालांकि काम की अधिकता के कारण अब रामराज ने गांव आना भी कम कर दिया था। वह जीवन संगिनी और दोनों बेटियों को भी महानगर में ही लाने की जुगाड़ में रहता। ताकि उसे भी कुछ आराम मिले और बेटियां महानगरीय शिक्षा पा सकें, लेकिन खर्चा अधिक बढ़ जाने और गांव से नाता टूट जाने का भय भी रहता। इसलिए रामराज ने सोचा कुछ पूंजी जोड़ ली जाए फिर जोखिम उठाना ठीक रहेगा।

इसी जद्दोजहद में 12-13 साल कब निकल गए पता ही नहीं चला। उधर गांव में दोनों बेटियां साइकिल से स्कूल की पढ़ाई पूरी करके प्रतियोगी परीक्षा पास करने का सपना देखने लगीं और इधर महानगर की आपाधापी में रामराज बच्चियों की शादी के लिए पैसा जुटाने में दिन-रात एक करता रहा।

जब काफी दिनों से पिता गांव नहीं आए तो परीक्षा के उपरांत बड़ी बेटी, ही पिता से मिलने महानगर आ गई। यू ंतो वह अपने पिता से मिलकर शिकायत करने वाली थी कि क्या पिताजी इतना कमाते हो, दिन-रात मेहनत करते हो और अपनी बेटियों से ही मिलने का समय नहीं मिल पाता, लेकिन जब बेटी ने देखा कि पिता एक मजदूर की तरह झुग्गी में बहुत कम और कुछ जरूरी सामान के साथ एक साइकिल के सहारे जीवन गुजार रहे हैं तो बेटी की रूलाई फूट पड़ी। उसके मन से शिकायत कहीं दूर जाती रही। पिता ने पूछा भी तो बेटी ने कह दिया बहुत दिन बाद मिल रही हूंॅ न, इसलिए रोना आ गया और अपने आंसू पोंछ लिये। पिता भी अपनी डबडबाई आंखों को साफ करते हुए घर के हालचाल पूछने लगे।

 

बेटी ने कहा भी कि चलिए पिताजी यहां कुछ नहीं रखा जीवन भर संघर्ष किया, क्या मिला? अपना गांव ही अच्छा है, पर पिता रामराज को तो जैसे अपनी बेटियों को किसी लायक बनाने का भूत सवार था। बेटी के स्कूल फिर से खुलते और वह वापस गांव लौटती इससे पहले ही संक्रमण की ऐसी दहशत फैली कि समूचे देश में लॉकडाउन लागू कर दिया गया। कल-कारखाने बंद हो गए। लाखों श्रमिक बेरोजगार। रामराज भी उनमें से एक था। लंबे अरसे बाद आराम मिला तो रामराज बीमार पड़ गया। रामराज और उसके साथियों के लिए कोरोना का भय तब तक ही था, जब तक कि उन्हें घर में रोटी मिल रही थी। पैसे खत्म हुए तो सभी साथी अपने-अपने गांव लौटने लगे। मोहल्ला खाली हो गया तो पिता ने भी घर लौट चलने का मन बना लिया, परंतु जाएं भी तो भला कैसे? रेल, बस यातायात तो पूरी तरह से बंद है।

तब बेटी ने बताया कि वह साइकिल चला लेती है, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं। हालांकि पिता असमंजस में थे, लेकिन करते भी क्या? बेटी की जिद के आगे हार मान गए। बेटी ने जरूरी सामान एक बैग में रखा और सुबह-सुबह पिता को पीछे बिठाकर साइकिल से ही निकल पड़ी गांव की ओर। बेटी पैडल-पर-पैडल मारती गई और सड़क की लंबाई अपने हौसले से नाप दी। दस-बारह या पचास किलोमीटर दूर नहीं, बल्कि 1200 किमी से अधिक की यात्रा। वह भी साइकिल से। सड़क मार्ग से यात्रा करते हुए बेटी ने जरा भी हिम्मत नहीं हारी और गुरूग्राम से दरभंगा तक डबल साइकिल चलाते हुए एक सप्ताह में गांव आ पहुंची। रास्ते में विश्राम भी किया तो वज्रासन और पद्मासन करके थकान मिटा ली, जो मिल गया तो खा लिया, नही ंतो बस एक ही धुन, किसी तरह अपने घर पहुंचना है, अपने गांव की माटी में लौटना है। अपनी मॉ की गोद में सिर रखकर सोना है, मॉ के हाथ का खाना है। बस यही एक ख्याल उसके कदम रूकने नहीं देता, थकने नहीं देता। घर याद आते ही हिम्मत और भी बढ़ जाती। मन में हौसला हो और कुछ अच्छा कर गुजरने की तमन्ना तो बाधाएं पार करते देर नहीं लगती।

और वह दिन भी आ गया जब सड़क से ही उन्हें अपना घर, अपना मोहल्ला दिखाई देने लगा। दोनों हर्षित हो उठे। बीमार पिता का चेहरा भी खिल उठा, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। जब गांव में लोगों ने देखा-सुना तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। बीमार पिता ने बताया कि जो काम वह बेटा होकर आज तक नहीं कर पाया वह काम इस बेटी ने कर दिखाया। सचमुच मुझे अपनी बेटी पर गर्व है। लोग बेटे को घर का दीपक कहते हैं, लेकिन मैं ये कहता हूं कि बेटी भी घर की ज्योति होती है। पिता की आंखें ये बताते हुए छलछला आईं कि जब ये अपनी मॉ के पेट में थी, तब हमने सोचा था कि पहली बेटी है तो दूसरा बेटा हो जाए, लेकिन भगवान जो करता है अच्छे के लिए ही करता है। अब तो गांव वाले भी कहने लगे: बेटियां यदि ठान लें तो क्या नहीं कर सकतीं। सच है लड़कियां किसी भी तरह लड़कों से कम नहीं। फिर मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। ये कहावत भी चरितार्थ होते दिखी। बेटी को साइकिल गर्ल के खिताब से नवाजा गया। देश-विदेश से बधाई और पुरस्कार भी मिले। सभी ने बेटी के साहस को सलाम किया।

ज्योति ने सिर्फ अपने घर की मुश्किल ही आसान नहीं की, बल्कि उनकी मुश्किलें भी हल कर दीं जो बेटी को बेटों से कम आंकते हैं और बेटी के होने पर दुःखी हो जाते हैं।

                                            ''आशीष अनमोल'' 

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