अनजान पिता-जो जीवन देता है, वही असली पिता होता है कहानी : अनजान पिता

‘‘हैप्पी फादर्स डे’’ दरवाजा खोलते ही सामने खड़ी महिला के मुख से ऐसे शब्द सुनकर राघव सहसा चौंक पड़े। वह महिला भी कुछ सकपकाई। इससे पहले की कुछ कहती। राघव ने ही प्रश्नवाचक दृष्टि फेंकते हुए कहा: 

‘‘आप?’’ जी मैं सीमा। रघुवीर सहाय जी का घर यही है न।


गोद में छोटे-से बच्चे को लिये सीमा ने बड़े ही अपनेपन से पूछा तो राघव दरवाजे से परे हट गए ताकि सीमा घर के अंदर आ सके।


ऐसे समय में जबकि लोग घरों में रहना ही बेहतर समझ रहे हैं और एक-दूसरे के घर आने-जाने से बच रहे हैं तब एक महिला का इतने आत्मविश्वास के साथ घर चले आना राघव को विस्मित कर रहा था। वह सोच में पड़ गया कि ऐसा क्या है जो सगे संबंधी आने में कतरा रहे हैं और ये अकेली महिला बच्चे को गोद में उठाये चली आ रही है।


फिर भी इस सबकी परवाह किये बगैर सीमा कहने लगी: मैं आज फादर्स डे पर अपने इस बच्चे को उनसे मिलाने लाई हूंॅ, कितना अच्छा हो यदि वे आज के दिन बच्चे को अपना आशीर्वाद दें तो..! राघव भी अपने जीवन के पांच दशक पार कर चुके थे, लेकिन एकदम से किसी ऐसी महिला के घर चले आने का कारण नहीं जान पा रहे थे, न ही महिला को वे पहचान ही सके।


बोले: आप कहीं और तो नहीं आ गईं? राघव ने पूछा तो सीमा ने कहा कि आपको देखकर तो यही लग रहा है कि वे आपके पिता ही होंगे। आपसे काफी कुछ मिलता हुआ चेहरा लगता है उनका भी।


अकस्मात् किसी महिला के इस तरह घर में चले आने से चकित राघव ने जिज्ञासा वश दूसरा प्रश्न उछाल दिया: आप पिताजी से ही क्यों मिलना चाहती हैं?


सीमा इधर-उधर देखने के बाद कुछ गंभीर हो गई। कहने लगी: दरअसल दो महीने पहले मैं भी आपके पिता की तरह ही कोरोना की चपेट में आ गई थी। उस समय मैं गर्भवती थी। महामारी का कहर ऐसा कि कहीं भी किसी अस्पताल में ऑक्सीजन बेड खाली नहीं मिले।


जहां भी पहुंच-प्रभाव का इस्तेमाल किया निराशा ही हाथ लगी। अपने से अधिक पेट में पल रहे बच्चे की चिंता सताने लगी। सीटी स्कैन से पता चला संक्रमण फेफड़ों को गिरफ्त में लेता जा रहा है। ऑक्सीजन लेबल नब्बे से नीचे गोते लगाने लगा।


कई जगह प्रयास के बाद जब कुछ नहीं सूझा तो पहुंच गए अस्पताल सोचा घर में रहकर परेशान होने से अच्छा है अस्पताल परिसर में ही पड़े रहें। अस्पताल में देखा तो हमारी तरह कई और लोग भी ऑक्सीजन बेड खाली होने की प्रतिक्षा में एम्बुलेंस में ही पड़े हैं। वहां भी मातम ही पसरा था, लोगों का दुःख देखा नहीं जा रहा था, पर क्या करती? सभी जगह यही हाल था।


इतना सुनना था कि राघव की सब समझ में आ गया। अस्पताल परिसर की वह भयावह रात उनकी आंखों के सामने घूम गई। सीमा बोलती चली गई और राघव बगैर कुछ कहे सब सुनता चला गया।


उस रात जैसे ही मुझे पता चला कि आपके पिताजी को ऑक्सीजन बेड मिल गया है तो एकाएक विचार कौंधा। मरती क्या न करती? डॉक्टरों के आगे तो एक अदद बेड के लिए खूब गिड़गिड़ा चुकी थी। आपके पिताजी से ही निवेदन करना उचित लगा और जैसे ही उनके लिए अंदर से व्हीलचेयर लाई गई। मैं उनके सामने जा खड़ी हुई और पूरा हाल सुनाते हुए रो पड़ी।


आपके पिताजी ने मेरी हालत देखी तो डॉक्टरों से कहने लगे: ‘‘मैंने तो अपनी जिंदगी 88 बरस जी ली, इस मां को मुझसे ज्यादा जरूरत है जीने की। मेरा पलंग उसे दे दिया जाए।’’


फिर क्या था? डॉक्टरों ने आपके पिताजी से लिखवा लिया और मुझे ऑक्सीजन बेड मिल गया। आपको यकीन नहीं होगा आपके पिताजी ने मानवता की ऐसी मिसाल पेश की कि कोरोना पीड़ित होने के बाद भी मैंने स्वस्थ्य बच्ची को जन्म दिया। आपके पिता का त्याग देखकर सभी की आंखें डबडबा आईं।


उसी दिन मैंने अस्पताल में सोच लिया था कि ऐसे मददगार इंसान के प्रति वह जरूर आभार प्रकट करेगी, परंतु इतनी व्यस्त हो गई कि आज फादर्स डे पर मुझे बरबस ही एक बार फिर उनका स्मरण हो आया। सोचा यदि आपके पिता उस दिन मुझे इतना बड़ा जीवनदान नहीं देते तो न मैं बचती और न ही ये प्यारी बच्ची मेरी गोद में होती..!


भावुक होती सीमा अपनी ही धुन में बोले चली जा रही थी। राघव को एक ओर चुपचाप खड़े देखकर सीमा ने भी मौन धारण कर लिया। फिर कुछ पल के सन्नाटे के बाद राघव ने कहा: पिताजी अब नहीं रहे? सुनकर सीमा अवाक् रह गई। पूछ बैठी: कब?


भावविभोर राघव ने कहा: मैं जब तब दवाईयों की व्यवस्था करके अस्पताल आया। पिताजी ने घर चलने की रट लगा ली और फिर चौथे दिन ही....!


पीछे हटते राघव के बगल वाले कमरे में सीमा ने देखा और माला डली तस्वीर की ओर कदम बढ़ा दिए। पिता की फोटो को प्रेम से निहारते हुए सीमा कहने लगीः धन्य हैं वे लोग जिनका जीवन औरों के काम आता है। पिता सिर्फ वही नहीं होते जो पालन-पोषण में मदद करते हैं, बल्कि असली पिता तो वे होते हैं जो औरों का जीवन बचाने में अपनी सांसों की भी परवाह नहीं करते। मैं भला इन्हें कैसे भूल सकती। इंसान तो चला जाता है एक भलाई ही है जो आपको लोगों के दिलों में जिंदा रखती है। आज यदि हम महामारी के संकट से उबर रहे हैं तो सिर्फ एक-दूसरे के प्रति इसी सेवा के जज्बे के साथ, इसी सहयोग की भावना के साथ।


फादर्स डे पर भले ही सब अपने पिता को शुभकामनाएं देते हों, परंतु मैं उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं और इसी बहाने कोरोना काल में दूसरों की सहायता, सेवा करते हुए प्राण गंवाने वाली विभूतियों को सच्चे मन से नमन कर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करती हूंॅ। ओम् शांति!

आशीष ‘‘अनमोल’’

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