एक कोरोना वारियर्स की कहानी : उसी की जुबानी सच्ची श्रद्धांजलि

पिता के जाने के बाद मन उदास तो हुआ, लेकिन फिर स्वयं को ये सोचकर मना लिया कि पिता का आशीर्वाद, उनका स्नेह हमेशा साथ है तो कैसा घबराना? और बस मैं जुट गई एक लक्ष्य, एक संकल्प लेकर मरीजों की सेवा में। लॉकडाउन लगा, संक्रमण फैला, महामारी ने कुछ पल को भयभीत किया, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी।

ये महामारी ही मेरे जीवन की, मेरे सेवा कार्यों की असल परीक्षा थी, जिसे मैंने अपनी मॉ के सहयोग और पिता के आशीर्वाद से ऐसा निखारा, कि लगा जैसे अपनी संकल्प शक्ति और सेवा कार्य से एक लड़की होने के नाते मैंने अपने दिवंगत पिता को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर दी हो।

पहले मैं ऐसी नहीं थी जैसी आज हूॅ। कुछ तो मुझे गऊ तक कहते, पर आज गर्व से दुर्गा बेटी या पहलवान डॉक्टर भी कह देते तो मैं मुस्कुरा देती हूॅं। एक वह समय था जब मैं हॉकी खिलाड़ी के रूप में स्वयं को तैयार कर रही थी। विनम्रता, अनुशासन, निरंतर अभ्यास और सबका सम्मान करना जैसे माता-पिता के दिये संस्कारों में बड़ी हो रही थी, लेकिन किशोर अवस्था पार करते यौवन की दहलीज तक आते-आते मैंने ये अनुभव किया कि अधिकांश लोग आपके अच्छेपन का, शराफत का, आपकी शालीनता, विनम्रता का गलत फायदा उठाते हैं, लोग आपके सीधेपन का दुरूपयोग करना चाहते हैं। लेकिन मैंने पूरे धैर्य से काम लिया। क्योंकि मेरा विश्वास ये रहा है कि अच्छे लोगों के साथ अच्छा होता है। फिर एक दिन मेरा ये भ्रम भी टूट गया जब एक रात मेरे पिताजी की तबियत खराब हुई। 

मैंने अस्पताल में जो कुछ देखा उससे लगा कि ऐसे तो मैं अपने पापा को नहीं बचा पाऊंगी, मैंने अस्पताल में और मरीजों का भी हाल-बेहाल देखा उनके परिजनों से बात की कि आप कुछ कहते क्यों नहीं? तो उन्होंने भी मेरे मुंह पर ये कहते हुए ताला जड़ दिया कि क्या करे बेटी, गरीबों की सुनता ही कौन है? अस्पताल में कई बार मरीज की देखभाल के लिए रात में भी जागना होता इसलिए मैं महापुरूषों के आदर्श वाक्य, विचार पढ़ने लगी। आजाद हिंद फौज के संस्थापक महान स्वतंत्रता सेनानी श्री सुभाषचंद्र बोस की जीवनी में मुझे एक और खास बात अंदर तक छू गई वह यह कि अन्याय करने वाले से ज्यादा अन्याय सहने वाला दोषी होता है। बस फिर क्या था मन में ये विश्वास और भी मजबूत हो गया कि आवाज तो उठानी ही पड़ेगी। ये मेरी अतिभावुकता थी या अंदर की टीस कि जब सुबह डॉक्टर राउंड पर आए तो मेरे सब्र का बांध टूट गया। लगा हमेशा चुप्पी साधे रहने से कुछ नहीं होगा और आक्रोश से भरा गुस्से का लावा फूट पड़ा। मेरा मानना है कि अव्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना, कतई गलत नहीं। डॉक्टर ने बात तो सुनी, लेकिन उनके जाते ही ये कह दिया गया कि यदि आपको ज्यादा तकलीफ है तो आप दूसरे किसी प्राइवेट अस्पताल में जा सकती हैं। मैं उससमय तो आंसू बहाकर रह गई, लेकिन उस दिन की आग आज भी मेरे अंदर धधक रही है। उस दिन मैंने मन.ही.मन संकल्प ले लिया कि मैं अब चुप बैठने वाली नहीं। देवी जी के मंदिर में जाकर भीगे नयनों से देर तक ताकती रही, देवी जी की प्रतिमा को, शेर को, त्रिशूल, तलवार, चक्र, गदा और वहां प्रज्जवलित दीये की लौ को। गहरी सांस छोड़ते हुए सोचाए किसी तरह एक बार पापा अच्छे हो जाएं

फिर देखना मैं सबको ठीक करती हूॅं।

उनको जवाब जरूर मिलेगा, जो ये समझते हैं कि वे चाहे जो कर सकते हैं कोई

कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उस दिन के बाद से मैंने अपना स्वभाव ही नहीं बदला

अपना हुलिया और कपड़े भी लड़कों वाले कर लिये ताकि कोई मुझे कमजोर

समझने की भूल न करे।


इसके बाद बदली हुई परिस्थितियों में जीवन में एक ऐसी पीड़ा, एक ऐसा संघर्ष

शुरू हो गया, जिसमें मेरे जीवन की दिशा और दशा ही बदल कर रख दी। मुझे

अनुभूति हुई कि दुर्गति से बचने-बचाने के लिए दुर्गा बनना ही पड़ेगा। दूसरों को

बदलने से पहले स्वयं को बदलना होगा और इसके बाद मैंने खिलाड़ी बनने और

मेडल जीतकर लाने के सपने को भुलाकर एक.एक सीढ़ी चढ़ते हुए मरीजों की सेवा
को ही जीवन का मिशन बना लिया।
उस दिन के बाद से मैंने अपना स्वभाव ही नहीं बदला, अपना हुलिया और कपड़े
भी लड़कों वाले कर लिये, ताकि कोई मुझे कमजोर समझने की भूल न करे। कभी
दिन तो कभी रात में ड्यूटी करते हुए नर्सिंग का काम सीखा और 15 वर्षों से यही
सेवा कार्य करती आ रही हूंॅ। इस दौरान कई नर्सिंग होम्स में ड्यूटी भी की,
लेकिन पता नहीं क्यों? मैं कहीं भी अन्याय होते नहीं देख पाती। गरीब मरीजों की
पीड़ा को देखते हुए कहीं भी प्रबंधन से नहीं बनी और फिर स्वयं की नर्सिंग केयर
सर्विस प्रारंभ कर दी। घर में बूढ़ी मॉ और बस मैं हूं। ऐसे बुजुर्ग मरीज जो बार-
बार अस्पताल नहीं जा पाते अथवा जो महंगी फीस अस्पताल में जमा नहीं कर
पातेए जो घर पर ही रहकर इलाज चाहते हैं उनके लिए घर पहुंच सेवा जैसे
इंजेक्शन, ड्रेसिंग, ड्रिप इंजेक्शन, पेशेंट केयर, ओल्ड ऐज केयर, पोस्ट डिलीवरी
केयर, फिजियोथैरेपी और डॉक्टर ऑन कॉल सेवा उपलब्ध करा रहीं हूंॅ।
जब लॉकडाउन लगा तो एक पल को मुझे ये लगा कि जैसे सब कुछ थम गया।
आपाधापी भरे जीवन में अब कुछ दिन घर में रहकर विश्राम करना चाहिए अपने
मन-मस्तिष्क को कुछ आराम देना चाहिए, लेकिन एक दि नही बीता होगा कि
दूसरे राज्य में रहकर नौकरी कर रही और मुझे वर्षों से भुलाये बैठी मेरी एक
सहेली को पता नहीं कहां से मेरी याद आ गई। उसका फोन आया और कहने
लगी। मेरी बुजुर्ग मॉ आपके ही शहर में हैं उनका ध्यान रखना प्लीज। तेरा ये
अहसान कभी नहीं भूलूंगी। बस फिर क्या था मन को फिर मजबूत किया और जुट

गई ऐसे बुजुर्ग मरीजों के सेवा कार्य में जो अस्पताल या डॉक्टर तक नहीं जा
सकते थे।
कोरोना संकट के दौर में जब कुछ सामाजिक संगठन जरूरतमंद लोगों को भोजन
उपलब्ध करा रहे थे और कुछ बेजुबान जानवरों की सहायता के लिए आगे आ रहे
थे तब एक युवती अकेले ही लॉकडाउन के नियमों का पालन करते हुए बुजुर्गों को
उपचार सुविधा और घर पहुंच सेवा उपलब्ध करा रही थी। राजधानी भोपाल के
नेहरू नगर में अपनी मॉ के साथ किराये के छोटे मकान में रहते हुए सेवा कार्य
करते हुए मुझे पता ही नहीं चला कि लोग मुझे विशेषकर गरीब मरीज पहलवान
डॉक्टर कहने लगे हैं तो अपने बच्चों से दूर अलग रह रहे बुजुर्ग डॉक्टर बेटी
कहकर बुलाते हैं। वो तो एक दिन मेरी बहन ने ही मुझे ये बात बताई।
कोरोना संकटकाल में जब मुझे पता चला कि कई अस्पताल यहां तक कि प्राइवेट
नर्सिंग होम्स भी बुजुर्गों को भर्ती करने से बच रहे हैं, तब समाज के हाशिये पर
पड़े बुजुर्गों की सुध लेने और उन्हें घर पर ही उपचार सहायता उपलब्ध कराने का
कार्य और भी तेजी से करना प्रारंभ कर दिया। कोरोना महामारी के भीषण संकट
को देखते हुए मेरे पास ऐसे मरीजों और उनके परिजनों के फोन आने लगे जिनके
बच्चे महानगरों में हैं और बुजुर्ग माता-पिता घर पर अकेले। ऐसे बुजुर्गों की घर के
सदस्य की तरह देखभाल का जिम्मा उठाया। सुबह चाय नहीं गुनगुने पानी से
शुरूआत होती है और फिर नींबू पानी पीने के बाद मुंह पर मास्क लगाकर, अपनी
डॉक्टरी किट उठाकर स्वयं की गाड़ी से मोबाइल लेकर निकल पड़ती, बुजुर्ग मरीजों
को नर्सिंग केयर प्रदान करने। इस दौरान वे सोशल डिस्टेंसिंग और सैनीटाइजेशन
के साथ ही लॉकडाउन के नियमों का भी पालन करती।
एक समय ऐसा भी था, जब पिताजी के असमय गुजर जाने के बाद घर आर्थिक
संकट से घिर गया। पढ़ाई के लिए पैसों की तंगी के चलते ट्यूशन की और नर्सिंग

का कार्य सीखा। यही वजह है कि अब भी कमाई से ज्यादा मरीजों के स्वास्थ्य पर
अधिक ध्यान केन्द्रित रहता है। कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए सिर्फ
बुजुर्ग मरीजों को उपचार की ही जरूरत नहीं थी, बल्कि उनमें जीने का
आत्मविश्वास जगाना भी जरूरी थी, जो कार्य बखूबी किया। मरीजों को इलाज में
सहायता के साथ उनसे बातचीत करते हुए उन्हें उचित खानपान के लिए भी प्रेरित किया।
अपने सेवा कार्य में इस कदर गुम हुई कि शादी ही नहीं की और जनसेवा को ही
अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। अच्छा लगता है कि मैं किसी के काम आ
रही हूं। कई युवा ये कहते हुए फोन करते हैं कि आप हमारे बुजुर्ग माता-पिता की
देखभाल कर रही हैं इसलिए हम इस संकटकाल में पूणे, बैंगलौर में निश्चिंत होकर
नौकरी कर पा रहे हैं। मन आनंदित हो जाता है जब बुजुर्ग जीभर कर आशीर्वाद
देते हैं, दुआ करते हैं मेरे लिये।
ये सब करते हुए मुझे लगता है कि मैं अपने पिताजी के ही अधूरे सपने को पूरा
करने का कार्य कर रही हूं। जब किसी मरीज को अच्छा होता देखती हूं तो लगता
है जैसे पिताजी मुस्कुरा रहे हैं। यही उनके लिए मुझे अपनी ओर से सच्ची
श्रद्धांजलि प्रदान करने की मन में अनुभूति होती है। ऐसा नहीं है कि मैं सिर्फ
जमाने से ही अपेक्षाएं रखती हूॅ जो मैं दूसरों में बदलाव देखना चाहती हूंॅ उसका
पहले स्वयं पालन भी करती हूॅं। मैं आज भी किराये के मकान में रहती हूॅं क्योंकि
इंसानियत, ईमानदारी और सेवाभाव पहली प्राथमिकता है। मुझे खुशी है कि अब
तक अपनी लगन-परिश्रम से हजारों मरीजों को उपचार लाभ पहुंचा चुकी हूंॅ।
मधुमेह, लकवा पीड़ित बुजुर्गों और विशेष बच्चों की सहायता के लिए सबसे पहले
आगे रहती हूॅं।

मेरा विश्वास है कि हम सबके अंदर अदम्य इच्छाशक्ति है हम सबके भीतर एक
ऐसी ऊर्जा भी है जो हमें दुःख से लड़ने, विपरीत हालातों से मुकाबला करने को
स्वतः ही प्रेरित करती है। हमें बस उसे जागृत करना होता ताकि लड़ सकें समाज
में फैले कोराना जैसे वायरस से। जयहिंद      

                                         vk'kh"k ^^vueksy^^

प्रिय पाठ्कों से अनुरोध है, अपनी प्रतिक्रिया-Comment कर सकते है, आपकी प्रतिक्रिया का हमें इंतजार रहेगा, ये आपका अपना मंच है, लेख पसंद आने पर Share और Like जरुर करें


Post a Comment

0 Comments