विष्णु जी के मंत्र ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करें।
कृं कृष्णाय नम:
मंत्र का जप करें।
रविवार, 7 जनवरी को नए साल की पहली एकादशी है। अभी पौष
मास चल रहा है और इसके महीने के कृष्ण में सफला एकादशी का व्रत किया जाता है। जैसा
कि इस एकादशी के नाम से ही समझ आ रहा है कि ये व्रत बाधाओं को दूर करके सफल होने
की कामना से किया जाता है। इस तिथि पर भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और
दिनभर विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत किया जाता है।
रविवार, 7 जनवरी को पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है।
इसे सफला एकादशी कहा जाता है। ये व्रत बाधाओं को दूर करने वाला और सफलता दिलाने
वाला माना गया है। इस बार सफला एकादशी रविवार को होने से इस दिन विष्णु जी के साथ
ही सूर्य देव की भी विशेष पूजा जरूर करें।
अभी ठंड के दिन
हैं, ऐसे में इस
एकादशी पर जरूरतमंद लोगों को गर्म कपड़ों का दान जरूर करें। एकादशी व्रत से जुड़े
कई नियम हैं, इन नियमों का
पालन करते हुए व्रत किया जाता है तो भक्तों की इच्छाएं जल्दी पूरी हो सकती हैं।
जानिए एकादशी व्रत से जुड़ी खास बातें....
जो लोग एकादशी
व्रत करते हैं, उन्हें एक दिन
पहले यानी दशमी तिथि की शाम से इसकी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। दशमी की शाम
संतुलित भोजन करना चाहिए। जल्दी सोना चाहिए, ताकि अगले दिन यानी एकादशी पर सुबह सूर्योदय के समय उठ सके।
सुबह जल्दी उठें
और स्नान के बाद सूर्य देव को जल चढ़ाएं। घर के मंदिर गणेश जी की पूजा करें। भगवान
विष्णु और महालक्ष्मी का अभिषेक करें। हार-फूल और वस्त्रों से श्रृंगार करें।
धूप-दीप जलाएं। तुलसी के साथ मिठाई का भोग लगाएं। भगवान के सामने एकादशी व्रत करने
का संकल्प लें।
दिनभर अन्न का
त्याग करें। भूखे रहना संभव न हो तो फलाहार और दूध का सेवन कर सकते हैं। एकादशी पर
भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करें। विष्णु जी की कथाएं पढ़ें-सुनें।
शाम को सूर्यास्त
के बाद विष्णु जी और देवी लक्ष्मी की विधिवत पूजा करें। तुलसी के पास दीपक जलाएं।
भजन करें।
अगले दिन यानी
द्वादशी तिथि पर सुबह उठें और विष्णु-लक्ष्मी की पूजा के बाद जरूरतमंद लोगों को
भोजन कराएं, दान-पुण्य करें।
इसके बाद खुद भोजन करें। इस तरह एकादशी व्रत पूरा होता है।
ये है एकादशी
व्रत की कथा
पुराने समय में
चंपावती राज्य के राजा थे महिष्मत। राजा बड़ा पुत्र लुंभक गलत आदतों में फंसा हुआ
था। इस वजह से राजा ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया।
लुंभक जंगल में
रहने लगा और फल खाकर अपना जीवन चलाने लगा। वह एक पीपल के नीचे रह रहा था। उसका
आचरण बदल चुका था। एक बार पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी पर लुंभक दिन भर भूखा
रहा और शाम को भगवान विष्णु का ध्यान कर लिया, इस तरह अनजाने में उसने एकादशी व्रत कर लिया। इस व्रत के
प्रभाव से लुंबक के सभी पापों का असर खत्म हो गया। लुंबक को अपना राज-पाठ वापस मिल
गया और उसका जीवन सुखी हो गया।
पौष मास के कृष्ण
पक्ष की एकादशी घर-परिवार की और कार्यों में आ रही परेशानियों को दूर करना वाला
व्रत है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड में एकादशी महात्म्य नाम के अध्याय में भगवान
श्रीकृष्ण ने पांडवों के बड़े भाई युधिष्ठिर को एकादशियों के व्रत के बारे में
बताया है।
एकादशी पर विष्णु
जी के साथ ही उनके अवतारों की भी पूजा करनी चाहिए, खासतौर पर श्रीराम और श्रीकृष्ण की पूजा जरूर करें।
श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल को भी माखन-मिश्री का भोग तुलसी के साथ
लगाएं। कृं कृष्णाय नम: मंत्र का जप करें।
श्रीराम दरबार की
पूजा करें। राम दरबार में श्रीराम के साथ देवी सीता, लक्ष्मण, हनुमान शामिल होते हैं। इन सभी की पूजा करने से घर-परिवार में सुख-शांति और
प्रेम बना रहता है। कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और लक्ष्य पूरे होते
हैं। ऐसी मान्यता है।
सफला एकादशी की
शाम घर के आंगन में तुलसी के पास दीपक जलाएं और परिक्रमा करें। सूर्यास्त के बाद
तुलसी को स्पर्श नहीं करना चाहिए। पूजा में शालिग्राम जी की प्रतिमा भी रखनी
चाहिए।
तुलसी और
शालिग्राम जी को हार-फूल, वस्त्र आदि पूजन
सामग्री अर्पित करें। फलों का भोग लगाएं। तुलसी के सामने बैठकर विष्णु जी के मंत्र
ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करें।
सुबह जल्दी उठें
और स्नान के बाद घर के मंदिर में गणेश पूजा करें। गणेश पूजन के बाद भगवान विष्णु
और देवी लक्ष्मी की पूजा करें। भगवान के सामने व्रत करने का संकल्प लें।
एकादशी व्रत करने
वाले भक्तों को दिनभर अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए। जो लोग भूखे नहीं रह पाते हैं,
वे फलाहार कर सकते हैं। फलों
के रस का सेवन करें। दूध पी सकते हैं।
इस दिन सुबह-शाम
विष्णु जी की पूजा करें। दिनभर विष्णु के मंत्र जपें, विष्णु जी की कथाएं पढ़ें-सुनें। अगले दिन या
द्वादशी पर सुबह फिर से विष्णु पूजन करें। पूजा के बाद जरूरतमंद लोगों को भोजन
कराएं और फिर खुद भोजन करें। इस तरह एकादशी व्रत पूरा होता है।
यदि आप अच्छा परिणाम पाना चाहते हैं, तो अपने पंडित जी की सलाह लेना ना भूलें।
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