कुश अमावस्या 27 अगस्त को : इस दिन कुशा तोड़कर घर लाते हैं, सबसे पवित्र होती है ये घास; इसके बिना अधूरी है हर पूजा इसे कुशग्रहणी और कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहते हैं।

कुश अमावस्या 27 अगस्त को : इस दिन कुशा तोड़कर घर लाते हैं, सबसे पवित्र होती है ये घास; इसके बिना अधूरी है हर पूजा  इसे कुशग्रहणी और कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहते हैं।

शनिवार, 27 अगस्त को भाद्रपद महीने की अमावस्या है। इसे कुशग्रहणी और कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहते हैं। इस तिथि पर कुश यानी पवित्र घास इकट्‌ठा की जाती है। जिसका इस्तेमाल शादी, गृह प्रवेश, श्राद्ध और अन्य मांगलिक कामों में किया जाता है। कुश के बिना हर पूजा अधूरी होती है। क्योंकि ये घास पवित्र करती हैं।

भादौ की इस अमावस्या पर पितरों के लिए श्राद्ध कर्म करने का विधान ग्रंथों में बताया गया है। इस दिन किसी पवित्र नदी में नहाना चाहिए। ऐसा न कर पाएं तो घर पर ही पानी में गंगाजल की कुछ बूंदे डालकर नहाएं और पितृ पूजा करें। इसके बाद दान भी करना चाहिए।

किस तरह की घास सबसे अच्छी

जिस घास में पत्ती हो, आगे का भाग कटा हुआ न हो और हरा हो, वो देवताओं और पितरों की पूजा के लिए सबसे अच्छी मानी गई है। ग्रंथों के मुताबिक इस अमावस्या पर सूर्योदय के वक्त घास लानी चाहिए। इस वक्त न ला पाएं तो दिन में अभिजित या विजय मुहूर्त में लाएं। सूर्यास्त के बाद घास नहीं तोड़नी चाहिए। कचरे और गंदगी के पास उगी हुई कुशा नहीं लानी चाहिए।

इस घास का आसन और अंगुठी सबसे पवित्र

ग्रंथों में बताया है कि कुशा घास से बना हुआ आसन सबसे ज्यादा अच्छा माना गया है। इस आसन पर बैठकर की गई पूजा से मिलने वाला पुण्य और बढ़ जाता है। हर तरह का अनुष्ठान और पूजा-पाठ कुश के आसन पर बैठकर की जा सकती है। ये आसन शरीर की ऊर्जा को जमीन में जाने से रोकता है। वहीं, मांगलिक कामों और पूजा-पाठ में इस घास को मोड़कर अंगुठी की तरह सीधे हाथ की रिंग फिंगर में पहना जाता है। ऐसा करने से पूजा में पवित्रता बनी रहती है।

क्यों पवित्र है ये घास

वेदों और पुराणों के मुताबिक कुश घास पवित्र होती है। इसे कुशा, दर्भ या डाभ भी कहते हैं। मत्स्य पुराण का कहना है कि भगवान विष्णु के वराह अवतार के शरीर से कुशा बनी है। अनुष्ठान और पूजा-पाठ में कुशा का इस्तेमाल खासतौर से किया जाता है। पितृ पक्ष में श्राद्ध के दौरान कुशा का उपयोग जरूरी है। इसके बिना तर्पण अधूरा माना गया है। इस घास की अंगूठी बनाकर तीसरी उंगली में पहनी जाती है। जिसे पवित्री कहते हैं। ग्रंथों में बताया है कि इसके इस्तेमाल से मन और शरीर, दोनों पवित्र हो जाते हैं।

पूजा-पाठ के लिए जगह पवित्र करने के लिए कुश से जल छिड़का जाता है। कुशा का उपयोग ग्रहण के समय भी किया जाता है। ग्रहण से पहले खाने-पीने की चीजों में कुशा डाली जाती है। ग्रहण काल के दौरान खाना खराब न हो और पवित्र बना रहे, इसलिए ऐसा किया जाता है।  रिसर्च में पता चला है कि कुश घास एक नेचुरल प्रिजर्वेटिव के रूप में काम करती है। इसका उपयोग दवाईयों में भी किया जाता है। कुश में प्यूरिफिकेशन एजेंट है।

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