बच्चों के लिए आप आईना हैं या यू कहें कि बच्चे आपका आईना हैं।

इसलिए कहते हैं कि जैसा आप अपने बच्चों को बनाना चाहते हैं, वैसे ख़ुद बनें। साथ ही यह भी जानना ज़रूरी है कि बच्चों के सामने कैसे ना बनें।

बच्चों के लिए आप आईना हैं या यू कहें कि बच्चे आपका आईना हैं। जैसे बड़े, वैसे बच्चे।


बच्चों को जैसी परवरिश और शिक्षा देना चाहते हैं वैसा ही आचरण माता-पिता को रखना चाहिए। बच्चे जो देखते-सुनते हैं वही उनके स्वभाव में आता है। इसलिए बच्चों के सामने जो भी कहें वो हमेशा सोच-समझकर कहें। जो आप कर रहे हैं, कह रहे हैं, उसे करने से बच्चों को यह कह कर नहीं रोक सकते कि ‘हम बड़े हैं, तुम बच्चे हो।’ यह अपने आप में एक और ग़लत धारणा बच्चों के मन में बैठाने की बात होगी क्योंकि जो नैतिक रूप से ग़लत है, वो हर उम्र के इंसान के लिए ग़लत है।


अपमानजनक भाषा का प्रयोग

बड़े अक्सर बातों बातों में किसी व्यक्ति के लिए अपमानजनक भाषा का उपयोग कर जाते हैं। उन्हें लगता है कि बच्चों ने सुना नहीं होगा या कई बार बड़े ही ध्यान नहीं देते कि आसपास बच्चे हैं और वे कुछ भी कह जाते हैं। वहीं बच्चे बड़ों की हर बात को बड़े ग़ौर से सुनते और समझते हैं। इसलिए कभी किसी के लिए अपशब्द या अभद्र भाषा का इस्तेमाल न करें।


कई बार लोग फोन पर भी ग़लत भाषा का प्रयोग कर लेते हैं।

इसलिए अगर घर में छोटे बच्चे हैं तो बेहद संभलकर बातचीत करें।

कमियां निकालना


घर से मेहमान जाने के बाद अकसर परिवार के सदस्य उस व्यक्ति को लेकर बातें करते हैं, तो कभी कमियां निकालते हैं। यही सब बच्चे भी देखते हैं और वे उस व्यक्ति के बारे में वैसी ही धारणा बना लेते हैं। बच्चों के मन पर इन सबका गहरा असर पड़ता है और वे भी बड़े होकर लोगों में कमियां ढूंढने लगते हैं। कई बार तो घर के सदस्य भी एक-दूसरे की पीठ पीछे बुराई करते नज़र आते हैं, ये बेशक सामान्य बातचीत जैसा हो लेकिन बच्चा बड़े ग़ौर से ये सब देखता-सुनता है। कई बच्चे तो सभी के सामने बोल भी देते हैं कि कौन किस व्यक्ति के बारे में क्या कह रहा था।


इसलिए कभी किसी की पीठ पीछे उसकी कमियां न निकालें न ही बुराई करें।

एक-दूसरे का अपमान


हर घर में और हर पति-पत्नी के बीच झगड़ा और नाराज़गी आम होती है। ऐसे में एक-दूसरे का अपमान करना या एक-दूसरे को नीचा दिखाना सही नहीं होता। बच्चा ये सब देखता है और उसी के आधार पर आपकी इज़्ज़त करता है। इसलिए जैसी इज़्ज़त आप बच्चे से चाहते हैं वैसा ही मान एक-दूसरे को दें। अगर किसी बात पर नाराज़गी तो उसे बंद कमरे में सुलझाएं न कि बच्चे के सामने ज़ाहिर करें। इसके अलावा बाक़ी सदस्य भी बच्चों के सामने एकदूसरे से अच्छी तरह से बातचीत करें।

इससे बच्चों में परिवार के प्रति प्रेम बढ़ता है और वो सभी का आदर करते हैं।


कसम का सहारा लेना

ये बेहद आम आदत है, जो अक्सर सभी में पाई जाती है। हर छोटी बात पर कसम खाकर ख़ुद को सही साबित करना। कई बार झूठ से बचने के लिए, तो कभी अपनी बात मनवाने के लिए तो कभी सच उगलवाने के लिए भी कसम का सहारा लिया जाता है। बच्चे ये सब देखते हैं और उन्हें लगता है कि ये ख़ुद को बचाने का तरीक़ा है। और वे इससे अपनी हर ग़लती छुपा सकते हैं। वे कसम को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं। उनकी ये आदत उम्र बढ़ने के साथ-साथ और प्रबल होती जाती है और वे हर बात पर कसम खाने लगते हैं फिर चाहे ज़रूरत हो या न हो।


इसलिए बच्चों के सामने कसम जैसे शब्दों का इस्तेमाल न करें।

बच्चों को हर बात पर लालच देना


आजकल के बच्चों से कोई भी काम कराना हो फिर चाहे होमवर्क हो या अपने खिलौने समेटना। हर काम के लिए उन्हें चॉकलेट, खिलौने का लालच देना ही पड़ता है। शुरुआत में माता-पिता की तरफ़ से दिया लालच बच्चों के व्यवहार में शामिल हो जाता है। फिर वे ख़ुद ही हर बात पर बोलने लगते हैं मैं ये करूंगा/करूंगी तो मुझे क्या मिलेगा। ऐसे में आपको मजबूरन कोई न कोई जवाब देना ही पड़ेगा। इसलिए बच्चों को हर बात पर लालच न दें।

अगर कुछ देना चाहते हैं तो काम करने के बाद दे सकते हैं, लेकिन हमेशा नहीं। बच्चों को इस तरह के व्यवहार की आदत न डलवाएं।

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