पति की लंबी उम्र और परिवार की समृद्धि के लिए किया जाता है वट सावित्री व्रत सावित्री ने पति के लिए 3 दिनों तक व्रत रखा

हिंदू धर्म में वट सावित्री का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण वट वृक्ष के नीचे होती है सावित्री और सत्यवान की मूर्ति की स्थापना, पूजा के बाद की जाती है बरगद की परिक्रमा

हिंदू धर्म में वट सावित्री का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और संतानहीन स्त्रियां गुणवान संतान पाने के लिए रखती हैं। हर साल ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को ये व्रत रखे जाने की परंपरा है। इस साल 10 जून, गुरुवार को ये व्रत किया जाएगा। इसमें बरगद यानी वट की पूजा की जाती है और 3 दिनों तक व्रत रखा जाता है।

वट वृक्ष के नीचे होती है मूर्ति स्थापना

इस व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर नहाने के बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। इस दिन वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व होता है। वृक्ष के नीचे सावित्री और सत्यवान की मूर्ति को रखें। इसके बाद मूर्ति और वृक्ष पर सभी पूजन सामग्री अर्पित करें। लाल कलावे को वृक्ष में सात बार परिक्रमा करते हुए बांधें। इस दिन व्रत कथा सुनकर भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।

पौराणिक कथा

पौराणिक कथा है कि सावित्री नामक एक पतिव्रता स्त्री थी, जिसने यमराज से लड़कर अपने पति के जीवन की रक्षा की थी, उसे पुनर्जीवित किया था। इसके लिए सावित्री ने बिना जल लिए और बगैर कुछ खाए 3 दिनों तक पति के प्राणों के लिए तपस्या की थीबरगद के नीचे ही पति को जीवन मिलने के बाद उसी पेड़ के फूल खाकर और जल पीकर सावित्री ने अपना उपवास पूरा किया था। इसलिए तब से बरगद को जीवन देने वाला पेड़ मानकर उसकी पूजा की जाती है। सावित्री के तप को ध्यान में रखकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना से सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके ये व्रत रखती हैं व अखंड सुहाग का वर पूजा आराधना से प्राप्त करती हैं।

भारत में कुछ जगह ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा को किया जाता है वट सावित्री व्रत, दक्षिण भारत में इसे करादाइयन नौंबू कहा जाता है

ज्येष्ठ महीने की अमावस्या पर वट सावित्री व्रत किया जाता है। ये इस बार 10 जून को रहेगा। नारद पुराण में इसे ब्रह्म सावित्री व्रत भी कहा गया है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र की कामना के साथ बिना कुछ खाए निर्जल व्रत करती हैं। साथ ही वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा और परिक्रमा कर के सौभाग्य की चीजों का दान करती हैं।

दक्षिण भारत में करादाइयन नौंबू

ये व्रत उत्तर भारत में ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को किया जाता है। वहीं देश के कुछ हिस्सों में इसी महीने की पूर्णिमा पर ये व्रत किया जाता है। वट सावित्री व्रत खासतौर से मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र में किया जाता है। वहीं दक्षिण भारतीय विवाहित महिलाएं विशेष रूप से तमिलनाडु और कर्नाटक में करादाइयन नौंबू के नाम से ये व्रत करती हैं।

3 दिन पहले से शुरू हो जाता है व्रत

वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा या अमावस्या के 3 दिन पहले से ही शुरू हो जाता है। ये व्रत त्रयोदशी तिथि यानी किसी भी पक्ष के तेरहवें दिन से शुरू होता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि सावित्री ने भी अपने पति के जीवन के लिए लगातार 3 दिनों तक व्रत रखा था।

पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि वटवृक्ष के मूल यानी जड़ों में भगवान शिव, मध्य में भगवान विष्णु और अग्रभाग में ब्रह्माजी रहते हैं। इसीलिए वट वृक्ष यानी बरगद को देव वृक्ष भी कहा गया है। इनके साथ देवी सावित्री का वास भी इसी पेड़ में माना जाता है।

सौभाग्य के लिए शिव-पार्वती और सावित्री पूजा

ज्येष्ठ महीने में ये व्रत किया जाता है। इस व्रत के एक दिन पहले महिलाएं मेहंदी लगाती हैं और सौलह श्रंगार की तैयारियां करती हैं। ऐसा करने के पीछे वैवाहिक जीवन में सौभाग्य और पति की लंबी उम्र पाने की कामना होती है। व्रत वाले दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफाई कर के नहाती हैं। इसके बाद पूजा की तैयारियों के साथ नैवेद्य बनाती हैं। फिर बरगद के पेड़ के नीचे भगवान शिव-पार्वती और गणेश की पूजा करती हैं। इसके बाद उस पेड़ को पानी से सींचती हैं। फिर पेड़ पर सूती धागा लपेटती हैं। श्रद्धानुसार कुछ महिलाएं 11 या 21 बार पेड़ की परिक्रमा के साथ धागा लपेटती हैं। कुछ महिलाएं 108 परिक्रमा भी करती हैं।

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