निःशक्त बच्चों को नया जीवन देने और उनके चेहरे पर मुस्कान लौटाने के मामले में मध्यप्रदेश एक कदम पीछे रह गया है। इस गंभीर मामले में छत्तीसगढ़ हमसे बाजी मार लेने में कामयाब रहा। यहां बात किसी प्रदेश की प्रतिस्पर्धा की नहीं हो रही है, लेकिन जब हम मध्यप्रदेश को विकसित राज्य बनाने का दावा करते हैं तब हमें हरेक पहलु पर विचार कर लेना होता है। यह इसलिए भी जरूरी है कि जिस मध्यप्रदेश में सरकार ने अपनी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए निःशक्तजन पंचायत बुलाई उसी प्रदेश में निःशक्त बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने और उनके माता-पिता को प्रोत्साहित करने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किये जा सके।
हालात तो यह हैं कि कईयों के माता-पिता तो अपने निःशक्त बच्चे का इलाज तो दूर सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं उठा सकते। निःशक्त पंचायत हुई जरूर लेकिन पहले से तय की गई योजनाओं को ही लागू किया गया। इस संबंध में किसी भी स्वयंसेवी संगठन की ओर से निःशक्त बच्चों को सशक्त बनाने के लिए कोई ठोस सुझाव नहीं दिया जाना और भी हैरत में डालने वाला है। निःशक्त बच्चों के हित में क्या कुछ किया जाना चाहिए या क्या कुछ हो सकता है इसपर सुझाव तो दूर की बात है विचार भी नहीं किया जा रहा है। समाज से उपेक्षित इन बच्चों की सरकार द्वारा जो उपेक्षा की जा रही है वह निंदनीय है। निःशक्त पंचायत में सुझाव दिया जाना ही महत्वपूर्ण नहीं था उन सुझावों पर अमल कराने के लिए भी आज तक किसी की ओर से मशाल नहीं उठाई गई। जो हो गया सो हो गया जो कर दिया सो बहुत। आखिर निःशक्त बच्चों की चिंता है किसे? फिर इनकी जरूरत या संख्या भी कितनी है?
ऐसा सोचने वाले यह भूल जाते हैं कि वे भी लाइलाज रोग की चपेट में आ सकते हैं रोग जाति, धर्म, या उम्र देखकर नहीं आता। आज जो स्थिति है उसमें लाइलाज रोगी इलाज के लिए इधर-उधर भटकने के अलावा कुछ नहीं पाता! आश्चर्य तो इस बात का है कि इस गंभीर मसले पर आज तक हमारे जागरूक नागरिक चुप्पी क्यों साधे रहे। जबकि हम आधुनिक विज्ञान की दुहाई देने में कहीं नहीं चूकते ! अफसोस कि निःशक्तजन पंचायत के बाद भी इस मसले पर कुछ नहीं किया जा रहा है और न ही सरकार ने इस पर गंभीरता से ही विचार करना जरूरी समझा।
जिन राज्यों की सरकार नेे निःशक्तता को गंभीरतापूर्वक चुनौती के रूप में लिया है। वहां थोड़े-बहुत ऐसे कार्य हुए हैं जिनसे आशा की किरण नजर आती है,ं लेकिन पूरी जानकारी के अभाव में वे भी नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं। इस गंभीर मसले पर विचार-विमर्श की आवश्यकता है। ताकि बच्चों की विकलांगता को न सिर्फ रोका जा सके, बल्कि थैरेपी ट्रीटमेंट से सामान्य बच्चों की तरह काबिल भी बनाया जा सके। अब तक देश में वैलूर में ही इस तरह का डायनोस्टिक सेंटर है। छत्तीसगढ़ समाज कल्याण विभाग ने रायपुर के पास माना में सेरेब्रल पाल्सी गेटलैब (एसपीजी) की स्थापना का निर्णय किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि लैब में मासूमों को नया जीवन मिलेगा। लैब में टेढ़े हाथ-पांव, अंग विच्छेद, मांसपेशियों में कमजोरी वाले बच्चों का वहां इलाज होगा। ऐसे बच्चों का परीक्षण किया जा सकेगा जो नकली अंग लगाकर संतुष्ट हैं। इससे ऐसे बच्चों को पूरी तरह ठीक करने में तो सफलता मिलने की उम्मीद है ही
फिजियोथैरेपिस्ट की ट्रेनिंग प्राप्त करने वाले छात्रों को रोजगार के नए अवसर भी मिल सकेंगे। राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 में इस तरह के बच्चों के इलाज का प्रावधान है। विशेषज्ञों का कहना है कि जन्म के समय ब्रेन में खाली जगह रह जाने की वजह से ब्रेन की बीमारी हो जाती है। इस वजह से बच्चों में सेंस और अंग संचालित करने वाले तत्व निष्क्रिय हो जाते हैं। जिन अंगों की मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं। उन मांसपेशियों की पहचान करने के लिए बच्चों की गतिविधियों की वीडियो शूटिंग की जा सकती है इससे यह पहचाना जा सकेगा कि कौन-सा हिस्सा दिमाग के कंट्रोल के बाहर है, उसका विशेष तकनीक से इलाज किया जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस ऐसे लैब प्रत्येक राज्य में हों और ऐसे बच्चों की संख्या को देखते हुए वहां स्पेशल लैब निर्मित की जाएं। जहां ट्रीटमेंट के लिए नई मशीनें, बायो इंजीनियर्स के अलावा स्पेशल एजुकेटर्स रहें।
छत्तीसगढ़ में निःशक्तजन पंचायत हुई या नहीं या वहां यह सुझाव किसने दिया ? प्रश्न यह नहीं है। प्रश्न यह भी नहीं है कि वहां निःशक्तों की संख्या कितनी है? प्रश्न यह है कि क्या छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों को अन्य राज्यों में साकार नहीं किया जाना चाहिए?
इस संबंध में दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट फाॅर न्यूरो डेवलपमेंटल डिसेबिलिटीज इंटरवेंशनल रिसर्च एक्टिविटीज (इंदिरा) ने भी आशा की किरण जगाई है। वहां एचबीओटी थैरेपी से इलाज के बारे में काफी कुछ किया जा रहा है,, जिसके तहत आॅटिज्म या सीपी बच्चों को एक चेंबर में बिठाकर आॅक्सीजन का दबाव बढ़ा दिया जाता है। इससे पानी की मात्रा ज्यादा हो जाती है और दिमाग की सही कोशिकाओं से निकल वह पानी और उसमें मौजूद आॅक्सीजन मृत कोशिकाओं तक पहुंचकर उन्हें जीवित करती हैं। क्यूबा की सरकार इसे मान्यता दे चुकी है। दृष्टिहीन, श्रवणबाधित, बधिर व मानसिक विकलांग बच्चों में एचबीओटी थैरेपी पर ट्रायल किये जा रहे हैं जिसके अच्छे परिणाम निकले हैं। बाबा फरीद इंस्टीट्यूट आॅफ स्पेषल चिल्ड्रन्स फरीदकोट पंजाब में चिलेसन परियोजना के तहत उपचार लाभ प्रदान किया जा रहा है। श्री सांई प्रसाद पोलियो एवं स्किन रिसर्च सेंटर भिलाई में भी बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के बेहतर प्रयास किये जा रहे हैं।
क्या होना चाहिए:
♦ निःशक्त बच्चांे के लिए उच्चस्तरीय चिकित्सा की व्यवस्था बहुत आवश्यक है।
♦ निःशक्तों को प्रत्येक क्षेत्र में आरक्षण का प्रावधान हो। बाबा साहेब की भावना के अनुरूप निःशक्त सबसे ज्यादा निर्बल, निसहाय और शोषित हैं। इनके सशक्तिकरण की ज्यादा जरूरत है।
♦ ऐसे उपायों पर चर्चा हो कि निःशक्त बच्चे नहीं बल्कि सशक्त बच्चे जन्म लें। निःशक्तों के उचित इलाज के लिए शोध की व्यवस्था हो।
♦ सभी स्पेशल स्कूलों में स्पेशलिस्ट और चिकित्सा सुविधा के इंतजाम हों जहां निःशक्तों के लिए स्पेशलिस्ट न हों उन्हें मान्यता न दी जाए।
♦ न्यूरोलाॅजिस्ट, फिजियोथैरेपिस्ट, स्पीच थैरेपिस्ट, स्पेशल एजुकेशन टीचर, आई स्पेशलिस्ट की व्यवस्था हो।
♦ कलर थैरेपी, नेचुरोपैथी, एक्युप्रेशर, रैकी, योगा, मेडीटेशन, सूर्य नमस्कार की व्यवस्था हो।
♦ सभी प्रकार की सुविधाएं एक स्थान पर मिल सकें इसके लिए एकल खिड़की प्रणाली की सुविधा हो।
♦ निःशक्त बच्चों और उनके परिवार के राशन कार्ड अलग बनाये जाएं और उन्हें अन्नपूर्णा योजना का लाभ दिया जाए।
♦ स्पेशल स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को आर्थिक सहायता का प्रावधान हो।
♦ जिन परिवारों में निःशक्त बच्चे हैं उन्हें तीन बच्चों पर लाड़ली लक्ष्मी योजना का लाभ दिया जाए। या परिवार नियोजन की शर्त को हटाया जाए।
♦ निःशक्त बच्चों का पालन-पोषण कर रहे कर्मचारियों को सरकारी सेवा में प्राथमिकता दी जाए और उन्हें काम के घण्टों में छूट प्रदान की जाए।
♦ स्पेशल खेल अकादमी बने जहां स्पेशल ओलंपिक के खिलाड़ी तैयार किये जाएं।
♦ स्पेशल कला जोन बनाया जाए जहां स्वयंसेवी संस्थाओं को निःस्वार्थ सेवा के लिए प्रेरित किया जा सके।
♦ निःशक्तों के पुनर्वास की बेहतर व्यवस्था की जाए।
♦ निःशक्तों की शिक्षा, खेल गतिविधियांे और उपचार में सहायता।
♦ निःशक्त बच्चों के प्रोत्साहन के लिए पुरस्कार योजना चलाई जाए।
♦ ऐसे वातावरण तैयार किया जाए ताकि निःशक्तों की सहायता के लिए सभी आगे आएं और निःशक्त भी सम्मान, स्वाभिमान से आगे बढ़ते हुए देश की मुख्यधारा में शामिल हो विकास में सहभागी बनें।
आवश्यकता है इन्हें सही दिशा, उचित इलाज और ऐसी योजनाओं की जो इनके जीवन को भी वरदान बना सकें। सेरेब्रल पाल्सी को लेकर चल रही भ्रांतियों को भी दूर करना जरूरी होगा तभी हम इस रोग पर पूरी तरह विजयश्री पाने में सफल हो सकेंगे। इस संबंध में इलाज की विधियों के साथ ही शोध की व्यवस्था भी करना होगी। यदि हमें वाकई शक्तिशाली, समृद्ध, साक्षर और प्रबुद्ध भारत का निर्माण करना है तो निःशक्तता को जड़ से मिटाना ही होगा।

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