पितृपक्ष की शुरुआत 2 सितंबर से हो रही है जो कि 17 तारीख तक रहेगा। इन दिनों में पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जाएगा। काशी के ज्योतिषाचार्य पं. गणेश मिश्र के अनुसार श्राद्धपक्ष में शुभ और मांगलिक काम भी किए जा सकते हैं। कुछ लोगों को मानना है कि इस दौरान शुभ काम नहीं किए जाते, लेकिन किसी ग्रंथ में ऐसा उल्लेख नहीं मिलता है। इस बार तिथियों की घट-बढ़ के बावजूद पितरों की पूजा के लिए 16 दिन मिल रहे हैं। आमतौर पर पितृपक्ष खत्म होते ही अगले दिन से नवरात्रि शुरू हो जाती है। लेकिन इस बार 19 साल बाद ऐसा संयोग बन रहा है जब पितृपक्ष के खत्म होने के एक महीने बाद नवरात्र शुरू होंगे।
इससे पहले 2001 में ऐसा हुआ था जब 2 से 17 सितंबर तक पितृपक्ष था और नवरात्रि 17 अक्टूबर को थी। इस साल भी तिथियों और तारीखों का ये दुर्लभ संयोग बन रहा है। अधिक मास होने के कारण ऐसी स्थिति बनती है। हिंदू पंचांग में तिथियों की घट-बढ़ के कारण साल के दिन कम हो जाते हैं और उन्हें एडजस्ट करने के लिए अधिकमास की व्यवस्था की गई है। जिस तरह लिप ईयर 4 साल में एक बार आता है उसी तरह अधिकमास हर 3 साल में एक बार होता है।ब्रह्म पुराण: श्राद्धपक्ष में वायु रूप में आते हैं पितृ
भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा से सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या तक 16 दिनों को पितृपक्ष या श्राद्धपक्ष कहा जाता है। उन्होंने बताया कि ब्रह्म पुराण के अनुसार श्राद्धपक्ष के 16 दिनों में पितृ वंशजों के घर वायु रूप में आते हैं। इसलिए उनकी तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और पूजा-पाठ करने का विधान है। इस बार पितृपक्ष में पूर्णिमा का श्राद्ध मंगलवार को होगा। इस दिन पूर्णिमा सुबह साढ़े 9 बजे के बाद शुरू होगी जो कि अगले दिन सुबह करीब 11 बजे तक रहेगी। इसलिए पूर्णिमा का श्राद्ध 1 और 2 सितंबर को भी किया जा सकेगा।
क्या है पितृपक्ष
पितृ पक्ष अपने कुल, परंपरा और पूर्वजों को याद करने और उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लेने का समय है। इसमें व्यक्ति का पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया तर्पण यानी जलदान और पिंडदान यानी भोजन का दान श्राद्ध कहलाता है। पूर्वजों की पूजा और उनकी तृप्ति के लिए किए गए शुभ कार्य जिस विशेष समय में किए जाते हैं उसे ही पितृपक्ष कहा गया है।
जरूरतमंद
लोगों को कराएं भोजन
पितरों की तृप्ति के लिए ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए। पितरों को जलांजलि दी जाना चाहिए। परिवार के मृत सदस्य की तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करना चाहिए। अगर तिथि नहीं पता हो तो सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है। इन 16 दिनों में जरूरतमंदों को भोजन बांटना चाहिए। पितरों का श्राद्ध और पिंडदान करने तथा ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितरों की आत्माएं तृप्त होती हैं। इसके परिणाम स्वरूप कुल और वंश का विकास होता है। परिवार के सदस्यों को लगे रोग और कष्टों दूर होते हैं।
सर्वपितृ
अमावस्या 17 सितंबर को
पितृपक्ष
का आखिरी दिन सर्वपितृ अमावस्या होती है। इस दिन परिवार के उन मृतक सदस्यों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु अमावस्या, पूर्णिमा या चतुर्दशी तिथि को हुई हो। अगर कोई सभी तिथियों पर श्राद्ध नहीं कर पाता तो सिर्फ अमावस्या तिथि पर श्राद्ध भी कर सकता है। अमावस्या पर किया गया श्राद्ध, परिवार के सभी पूर्वजों की आत्माओं को प्रसन्न करने के लिये काफी होता है। जिन पूर्वजों की पुण्यतिथि नहीं पता हो उनका श्राद्ध भी अमावस्या पर किया जा सकता है। इसीलिए इसे सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या भी कहा जाता है। इसके साथ ही पूर्णिमा पर मृत्यु प्राप्त करने वालों के लिये महालय श्राद्ध भी अमावस्या पर किया जा सकता है। इस बार सर्वपितृ अमावस्या 17 सितंबर को है।
गया का महत्व है गयासुर की वजह से, ब्रह्मकपाल में शिवजी को ब्रह्म हत्या के पाप से मिली थी मुक्ति
नासिक में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक है त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग
बुधवार,
2 सितंबर से 16 दिनी श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहा है। इन दिनों में पितरों के लिए पिंडदान किया जाता है। हर साल पितृ पक्ष में बिहार के गया, महाराष्ट्र के नासिक, मध्यप्रदेश के उज्जैन और उत्तराखंड के ब्रह्मकपाल में लाखों लोग पिंडदान करने पहुंचते हैं। कोरोना के कारण इस साल हालात काफी बदले से हैं। श्राद्ध तर्पणा आदि के इन प्रमुख तीर्थों से रौनक गायब है।
क्यों है गया श्राद्ध का सबसे बड़ा तीर्थ - पुराने समय में गयासुर नाम के दैत्य को देखने से या छूने से ही लोगों के पाप दूर जाते थे। ये स्थान उसी गयासुर के नाम पर प्रसिद्ध है। गयासुर का शरीर पांच कोस था। उसने इसी जगह पर देवताओं को यज्ञ के लिए अपना शरीर दिया था। यहां मुख्य रूप से फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, नदी के किनारे अक्षयवट पर पिंडदान किया जाता है।
ब्रह्मकपाल क्षेत्र में शिवजी को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। इसीलिए यहां पिंडदान करने का विशेष महत्व है।
ब्रह्मकपाल क्यों खास है - मान्यता है प्राचीन समय में शिवजी ने अपने त्रिशूल से ब्रह्माजी का एक सिर काट दिया था। तब ब्रह्माजी का सिर त्रिशूल पर चिपक गया था। ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए शिवजी बद्रीनाथ के पास अलकनंदा नदी के किनारे पहुंचे। यहां त्रिशूल से ब्रह्मा का सिर मुक्त हो गया। तभी से ये स्थान ब्रह्मकपाल से प्रसिद्ध हो गया। पांडवों ने भी इस स्थान पर पितरों के लिए तर्पण
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